
AI में चेतना की संभावना जैसी खास बात, इस विषय को देख रहे किसी दोस्त के साथ समझने लायक संदर्भ देती है।

AI में भी आ सकती है चेतना कहानी का प्रवाह और मुख्य तथ्य
दो शोधकर्ता — कैलिफोर्निया के प्रोफेसर एरिक श्विट्जगेबेल और लिस्बन के डॉ. जेरेमी पोबर — ने एक ऐसा सिद्धांत प्रस्तावित किया है जिसे 'चेतना का कोपरनिकस सिद्धांत' कहा जा रहा है। इसके अनुसार, चेतना केवल मानव या जैविक जीवों तक सीमित नहीं है। यह विचार निकोलस कोपरनिकस की खोज पर आधारित है, जिसने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है। इसी तरह, यह नया सिद्धांत कहता है कि मनुष्य चेतना के केंद्र भी नहीं हैं।
शोधकर्ता मानते हैं कि चेतना 'सब्सट्रेट-फ्लेक्सिबल' हो सकती है — यानी वह अलग-अलग सामग्रियों में भी विकसित हो सकती है। इसका मतलब है कि सिलिकॉन-आधारित एलियन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) भी चेतन हो सकते हैं। डॉ. पोबर और श्विट्जगेबेल के अनुसार, अगर जीवन कार्बन के बजाय सिलिकॉन पर आधारित हो सकता है, तो चेतना के लिए भी जैविक शरीर जरूरी नहीं होना चाहिए।
हालांकि दोनों वैज्ञानिकों के बीच AI को लेकर मतभेद है। डॉ. पोबर मानते हैं कि AI इतना अलग है कि उसमें चेतना की संभावना कम है, जबकि प्रोफेसर श्विट्जगेबेल कहते हैं कि अगर हम जैविक शरीर को चेतना की शर्त नहीं मानते, तो सिलिकॉन-आधारित सिस्टम को बाहर रखना तर्कहीन है। यह बहस न केवल AI के भविष्य को लेकर है, बल्कि ब्रह्मांड में जीवन की संभावना को लेकर भी है।
तथ्य
- प्रोफेसर एरिक श्विट्जगेबेल (कैलिफोर्निया) और डॉ. जेरेमी पोबर (लिस्बन) ने चेतना के 'कोपरनिकस सिद्धांत' पर शोध किया है।
- सिद्धांत के अनुसार, चेतना केवल जैविक शरीर तक सीमित नहीं है और सिलिकॉन-आधारित सिस्टम में भी हो सकती है।
- डॉ. पोबर AI में चेतना की संभावना पर संदेह जताते हैं, जबकि प्रोफेसर श्विट्जगेबेल इसे संभव मानते हैं।
- शोधकर्ता मानते हैं कि अगर एलियन जीवन सिलिकॉन पर आधारित हो सकता है, तो चेतना के लिए जैविक शरीर जरूरी नहीं है।
- यह विचार निकोलस कोपरनिकस की खोज से प्रेरित है, जिसने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है।
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