
चीन के प्रतिबंध से जापान को झटका लगा है, लेकिन इस बदलाव के पीछे की रणनीति को समझना एक तकनीकी नीति में रुचि रखने वाले सहकर्मी के लिए उपयोगी हो सकता है।

चीन का दुर्लभ धातु दबाव कहानी का प्रवाह और मुख्य तथ्य
चीन ने जापान को दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे तकनीकी और रक्षा उद्योगों के लिए अहम यट्रियम, टर्बियम और डिस्प्रोसियम की कीमतें आसमान छू गई हैं। इस कदम के पीछे चीन की रणनीतिक निर्भरता को लचीला बनाने की कोशिश है। अमेरिका के आग्रह के बावजूद यह प्रतिबंध जारी रहना चीन की आर्थिक ताकत को दिखाता है।
दुनिया के 90% दुर्लभ धातुओं की प्रसंस्करण क्षमता चीन के पास है, भले ही भंडार अन्य देशों में हों। इसलिए जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अब वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला बनाने पर काम कर रहे हैं। भारत भी घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ₹7,280 करोड़ की योजना लाया है।
भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ धातु भंडार है, लेकिन प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी है। चीन के प्रतिबंध ने न केवल जापान को प्रभावित किया है, बल्कि वैश्विक तकनीकी उद्योगों के लिए एक चेतावनी भी जारी की है कि आपूर्ति में एकाधिकार कितना खतरनाक हो सकता है।
तथ्य
- चीन ने जापान को दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध बढ़ा दिया है, जिससे मार्च-अप्रैल 2026 में आपूर्ति 80% तक गिर गई।
- यट्रियम की कीमत लगभग 1,100 डॉलर प्रति किलोग्राम, टर्बियम 4,500 डॉलर और डिस्प्रोसियम 1,450 डॉलर प्रति किलोग्राम हो गई।
- दुनिया के 90% दुर्लभ धातु प्रसंस्करण का नियंत्रण चीन के पास है।
- भारत ने ₹7,280 करोड़ की योजना मंजूर की है ताकि 2025 तक 6,000 MTPA की घरेलू REPM उत्पादन क्षमता विकसित की जा सके।
- चीन के पास 44 मिलियन मीट्रिक टन दुर्लभ धातु भंडार हैं, जबकि भारत के पास 6.9 मिलियन टन हैं।
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