
कम ऑपरेटिंग लागत वाला ग्रिपेन अब तमाम देशों की पहली पसंद बन रहा है, इस बदलाव को देखने वाले किसी दोस्त के साथ समझने लायक संदर्भ है।

ग्रिपेन की बढ़त, राफेल को मिले झटके कहानी का प्रवाह और मुख्य तथ्य
दुनिया भर के देश अब फ्रांस के महंगे राफेल फाइटर जेट के बजाय स्वीडन के सस्ते ग्रिपेन जेट पर ध्यान दे रहे हैं। इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देश राफेल डील से पीछे हट रहे हैं, क्योंकि राफेल की खरीद और संचालन लागत बहुत अधिक है। ग्रिपेन, जो 4.5 पीढ़ी का मल्टी-रोल फाइटर जेट है, एकल इंजन वाला होने के कारण कम खर्चीला है और छोटे रनवे से भी उड़ान भर सकता है।
राफेल की ऑपरेटिंग लागत प्रति उड़ान घंटे 16,000 से 20,000 डॉलर के बीच है, जबकि ग्रिपेन पर केवल 4,000 से 4,500 डॉलर प्रति घंटा खर्च आता है। एक राफेल जेट की कीमत लगभग 120 मिलियन डॉलर है, जबकि ग्रिपेन लगभग 80 मिलियन डॉलर में उपलब्ध है। इस अंतर के कारण कई देश अब ग्रिपेन की ओर झुक रहे हैं।
भारत अभी भी राफेल पर भरोसा कर रहा है और 114 अतिरिक्त राफेल जेट खरीदने की योजना पर आगे बढ़ रहा है। लेकिन वैश्विक स्तर पर ग्रिपेन की मांग बढ़ रही है। यूक्रेन 100 से 150 ग्रिपेन जेट खरीदने की योजना बना रहा है। दोनों जेटों के अपने फायदे और नुकसान हैं, लेकिन बजट सीमा वाले देशों के लिए ग्रिपेन अब ज्यादा आकर्षक विकल्प बन रहा है।
तथ्य
- ग्रिपेन की ऑपरेटिंग लागत राफेल की तुलना में लगभग चार गुना कम है।
- इंडोनेशिया ने अतिरिक्त राफेल जेट खरीदने पर ब्रेक लगा दिया और चीनी जे-10 सी जेट की संख्या दोगुनी कर दी।
- यूएई ने राफेल डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर फ्रांस के साथ तनाव झेला।
- ग्रिपेन की कीमत लगभग 80 मिलियन डॉलर है, जबकि राफेल की कीमत लगभग 120 मिलियन डॉलर है।
- यूक्रेन 100 से 150 ग्रिपेन जेट खरीदने की योजना पर काम कर रहा है।
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